रायगढ़। रायगढ़ जिला जहाँ उद्योगों की चिमनियां दिन-रात धुंआ उगल रही हैं, वहां समाज के हक का ‘गुलाल’ उड़ रहा है। कंपनी एक्ट की धारा 135 को कागजों में दफन कर करीब 32 उद्योग करोड़ों की सीएसआर राशि डकार रहे हैं, और विडंबना देखिए कि प्रशासन के पास उनकी बैलेंस शीट तक नहीं है रायगढ़ में जितने उद्योग हैं, उनकी सीएसआर राशि से ही सैकड़ों विकास कार्य हो जाएंगे, लेकिन अफसोस की बात है कि कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के नियमों की परवाह प्रशासन को भी नहीं है। करीब 35 उद्योग सीएसआर के तहत काम करने के लिए बाध्य हैं, लेकिन तीन ही इसकी राशि जमा कर रहे हैं स्वीकृत कार्यों में व्यय कर रहे हैं। कहने को सीएसआर शाखा है लेकिन यहां कोई काम नहीं होता।
सरकार ने कॉर्पोरेट सेक्टर को समाज के प्रति जवाबदेह बनाने के लिए कंपनीज एक्ट 2013 के तहत प्रावधान किए थे। इसमें धारा 135 के मुताबिक 500 करोड़ से अधिक नेटवर्थ या 1000 करोड़ से अधिक टर्नओवर या 5 करोड़ से अधिक नेट प्रॉफिट वाली कंपनियां सीएसआर के दायरे में आती हैं। तीनों में से किसी एक शर्त के अंतर्गत पात्र पाए जाने पर कंपनी को तीन साल के औसत नेट प्रॉफिट का दो प्रश सीएसआर के तहत खर्च करना है। इस हिसाब से रायगढ़ जिले में 12 से भी ज्यादा उद्योग पात्र पाए जाएंगे। इसके लिए उद्योग विभाग और प्रशासनिक शाखा को थोड़ी मेहनत करनी होगी। मजे की बात यह है कि सीएसआर के तहत कितनी कंपनियां आती हैं, यही पता नहीं है।
वर्तमान में केवल एनटीपीसी लारा, एसईसीएल और एनटीपीसी तलाईपाली ही सीएसआर के तहत कार्य कर रहे हैं या प्रशासन को फंड उपलब्ध करवा रहे हैं। सीएसआर शाखा प्रभारी ने अभी तक उद्योगों की जवाबदेही ही तय नहीं की है। उद्योग विभाग तो सीएसआर से पल्ला झाड़ लेता है। ऐसे में कौन सा विभाग कंपनियों की नाक में नकेल डालेगा? दरअसल, कंपनियों की बैलेंस शीट मंगवाकर उनका नेटवर्थ, टर्नओवर और नेट प्रॉफिट का परीक्षण किया जाना है। कई सालों से यह काम नहीं हुआ जिसका फायदा उठाकर कंपनियां करोड़ों रुपए बचा रही हैं।
नहीं खर्च करती कंपनियां
कंपनियों को तीन शर्तों के हिसाब से परीक्षण कर सीएसआर के तहत अनुमोदित कार्य कराने हैं। सीएसआर शाखा का गठन तो किया गया है लेकिन उद्योग इनकी बात सुनते ही नहीं। कलेक्टर ने सभी कंपनियों से बैलेंस शीट जमा करने को कहा है। इसका परीक्षण करने के बाद पूछा जाएगा कि किसने कितना काम किया। हैरानी की बात है कि प्रतिवर्ष करोड़ों रुपए के काम सीएसआर से हो सकते थे लेकिन लापरवाही की वजह से लोगों को लाभ नहीं मिल सका।
उद्योग विभाग को नहीं कोई सरोकार
प्लांटों को जमीन लीज पर उपलब्ध कराने वाला उद्योग विभाग भी सीएसआर से सरोकार नहीं रखना चाहता। इस बारे में जीएम डीआईसी अंजू नायक से बात की गई तो उन्होंने कहा कि सीएसआर के लिए विभाग नियमत: अधिकृत नहीं है। न तो किसी उद्योग को नोटिस दे सकते हैं और न ही राशि जमा करा सकते हैं। यह विभाग केवल उद्योगों की सुविधा के लिए बनाया गया है। अब सवाल उठता है कि सीएसआर के करोड़ों रुपए जो उद्योगों ने जमा नहीं कराए, उसकी रिकवरी कैसे होगी।
